अपराजिता स्तोत्र | Aparajita Stotra

अपराजिता का अर्थ है, जो कभी पराजित नहीं हुआ, विजयदशमी और देवी अपराजिता का सम्बन्ध क्षत्रिय राजाओं के साथ गहरा सम्बन्ध रखता है, अपराजिता क्षत्रियों की महादेवी है। अपराजिता देवी बहुत संहार कारणी महाशक्ति है, अपराजिता स्तोत्र का पाठ करने वाला या देवी की पूजा करने वाला साधक, विषम से विषम परिस्थतियों में भी पराजित नही हो सकता, अपराजिता देवी अपने भक्त को कभी भी पराजय का मुख नही देखने देती, जब  सारे रास्ते बंद जाए, कोई रास्ता नही हो, तब भी अपराजिता देवी अपने भक्त को हस्ते-खेलते बचा ले जाती है, चाहे कितनी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत हो।

सर्वप्रथम देवी अपराजिता की पूजा, साधना, तब प्रारम्भ हुई थी, जब जब देवासुर संग्राम के दौरान नवदुर्गाओ  शक्ति ने दानवों के सम्पूर्ण वंश का नाश कर दिया था। उसी समय माँ दुर्गा अपनी पीठशक्तिओं में से एक आदि शक्ति का प्रदुभाव किया, जिसे हम अपराजिता देवी के नाम से जानते है, उसी समय यह अपराजिता स्तोत्र/अपराजिता स्तोत्र के माध्यम से, माँ अपराजिता की स्तुति हुई, उसके बाद माँ हिमालय में अंतर्ध्यान हो गयी।

इसके बाद आर्यवर्त के राजाओ ने विजय पर्व के रूप में विजय दशमी की स्थापना की, जो शरद ऋतू में नवरात्री के बाद दसमी तिथि के दिन, विजय दशमी के नाम से मनाई जाती है। विजय दशमी पर्व मूलत: देवताओं द्वारा दानवो पर विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसके पश्चात पुन: जब त्रेता युग में रावण के अत्याचारों से पृथ्वी एवं देव दानव सभी त्रस्त हुए तो पुन: पुरषोत्तम राम द्वारा दशहरे के दिन रावण का अन्त किया गया, जो एक बार पुन: विजयदशमी के रूप में मनाये जाने लगा।

अपराजिता स्तोत्र पाठ विधि:

अपराजिता स्तोत्र का पाठ किसी भी शुक्रवार से, शाम के समय (6:30-8:30PM) या रात के समय (9:30-10:30PM) के बीच, जिस समय आपका मन अंदर से शांत हो, लाल ऊनि आसन पर, पूर्व या दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठे, अपने समाने माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें, माँ के सामने सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाये और अपने गले में अपराजिता गुटिका धारण करकें, अपने गुरु, पितृ, इष्ट ओर अपराजिता देवी से, अपने कार्य में पूर्ण सफलता के लिए प्रार्थना करें, कमाना बोलते हुए माँ दुर्गा के चरणों में 8 गुलाब, गुल्हड़ या लाल कनेर के पुष्प चढायें, पुष्प चढ़ाकर, सीधे हाथ में जल लेकर अपराजिता विनयोग करें, विनियोग के बाद जल भूमि पर छोड़ दे।

इसके बाद उच्च स्वर में बोलते हुए, अपराजिता  स्तोत्र के 8 पाठ 21 दिनतक करें, ऐसा करने से बड़ी से बड़ी बीमारी, कोर्ट केस, शत्रु, तंत्र बाधा, चुनाव, प्रतियोगिता आदि में शत प्रतिशत सफलता मिलती है, यह अजमाया हुआ प्रयोग है।

अपराजिता स्तोत्र के लाभ:

• इस स्तोत्र से सभी नवग्रह का दोष, कालसर्प दोष, पितृ दोष, दरिद्र दोष, मांगलिक दोष आदि समाप्त हो जाता है।

• भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मुक्ति मिलती है, नकारात्मक शक्तिओं का नाश हो जाता है।

• कार्य पर विजय प्राप्त करने के लिए संसार में इससें बड़ा कोई स्तोत्र नही है।

• मनुष्य की सभी मनोकामना सिद्ध होती है।

• जाने-अनजाने किये गए या हुए पापों का विनाश हो जाता है।

• विद्ध्यार्थियो को परीक्षा में निश्चित ही सफलता मिलती है।

• नि:सन्तान को सन्तान प्राप्ति के द्वार खुल जाते है।

• सरकारी कामो में सफलता प्राप्त होती है।

• किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं होता, सभी प्रकार के उपद्रव शांत हो जाते है।

• शत्रु के द्वारा किये हुए मारण, मोहन, उच्चाटन आदि तंत्र दोष नष्ट होते है।

• ईडी, सीबीआई, सीईडी जैसे यदि बुरे केस लग जाते तो, अवश्य ही अपराजिता स्तोत्र का पाठ करें।

• चुनाव में विजय प्राप्त होती है, सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है।

• इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से संक्रामक रोग (बर्डफ्लू, सॉर्स, स्वाइनफ्लू, करोनावायरस आदि) से रक्षा होती है।

• कैंसर, एड्स, हृदय रोग, त्वचा रोग आदि जैसे असाध्य रोग शांत होते है

अपराजिता स्तोत्र हिंदी | Aparajita Stotra Lyrics

श्रीत्रैलोक्यविजया अपराजितास्तोत्रम् ।

ॐ नमोऽपराजितायै ।

ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः

वामदेव-बृहस्पति-मार्कण्डेया ऋषयः ।

गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती छन्दांसि ।

लक्ष्मीनृसिंहो देवता ।

ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं बीजम् ।

हुं शक्तिः ।

सकलकामनासिद्ध्यर्थं अपराजितविद्यामन्त्रपाठे विनियोगः ।

ॐ नीलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणान्विताम् ।

शुद्धस्फटिकसङ्काशां चन्द्रकोटिनिभाननाम् ॥ १॥

शङ्खचक्रधरां देवी वैष्ण्वीमपराजिताम्

बालेन्दुशेखरां देवीं वरदाभयदायिनीम् ॥ २॥

नमस्कृत्य पपाठैनां मार्कण्डेयो महातपाः ॥ ३॥

मार्कण्डेय उवाच –

श‍ृणुष्वं मुनयः सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम् ।

असिद्धसाधनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम् ॥ ४॥

ॐ नमो नारायणाय, नमो भगवते वासुदेवाय,

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रशीर्षायणे, क्षीरोदार्णवशायिने,

शेषभोगपर्य्यङ्काय, गरुडवाहनाय, अमोघाय

अजाय अजिताय पीतवाससे,

ॐ वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,

हयग्रीव, मत्स्य कूर्म्म, वाराह नृसिंह, अच्युत,

वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर राम राम राम ।

वरद, वरद, वरदो भव, नमोऽस्तु ते, नमोऽस्तुते, स्वाहा

ॐ असुर-दैत्य-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच-कूष्माण्ड-

सिद्ध-योगिनी-डाकिनी-शाकिनी-स्कन्दग्रहान्

उपग्रहान्नक्षत्रग्रहांश्चान्या हन हन पच पच

मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय विद्रावय विद्रावय

चूर्णय चूर्णय शङ्खेन चक्रेण वज्रेण शूलेन

गदया मुसलेन हलेन भस्मीकुरु कुरु स्वाहा ।

ॐ सहस्रबाहो सहस्रप्रहरणायुध,

जय जय, विजय विजय, अजित, अमित,

अपराजित, अप्रतिहत, सहस्रनेत्र,

ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल,

विश्वरूप बहुरूप, मधुसूदन, महावराह,

महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण,

पद्मनाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषीकेश,

केशव, सर्वासुरोत्सादन, सर्वभूतवशङ्कर,

सर्वदुःस्वप्नप्रभेदन, सर्वयन्त्रप्रभञ्जन,

सर्वनागविमर्दन, सर्वदेवमहेश्वर,

सर्वबन्धविमोक्षण,सर्वाहितप्रमर्दन,

सर्वज्वरप्रणाशन, सर्वग्रहनिवारण,

सर्वपापप्रशमन, जनार्दन, नमोऽस्तुते स्वाहा ।

विष्णोरियमनुप्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ।

सर्वसौभाग्यजननी सर्वभीतिविनाशिनी ॥ ५॥

सर्वैंश्च पठितां सिद्धैर्विष्णोः परमवल्लभा ।

नानया सदृशं किङ्चिद्दुष्टानां नाशनं परम् ॥ ६॥

विद्या रहस्या कथिता वैष्णव्येषापराजिता ।

पठनीया प्रशस्ता वा साक्षात्सत्त्वगुणाश्रया ॥ ७॥

ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ८॥

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यभयामपराजिताम् ।

या शक्तिर्मामकी वत्स रजोगुणमयी मता ॥ ९॥

सर्वसत्त्वमयी साक्षात्सर्वमन्त्रमयी च या ।

या स्मृता पूजिता जप्ता न्यस्ता कर्मणि योजिता ।

सर्वकामदुघा वत्स श‍ृणुष्वैतां ब्रवीमि ते ॥ १०॥

य इमामपराजितां परमवैष्णवीमप्रतिहतां

पठति सिद्धां स्मरति सिद्धां महाविद्यां

जपति पठति श‍ृणोति स्मरति धारयति कीर्तयति वा

न तस्याग्निवायुवज्रोपलाशनिवर्षभयं,

न समुद्रभयं, न ग्रहभयं, न चौरभयं,

न शत्रुभयं, न शापभयं वा भवेत् ।

क्वचिद्रात्र्यन्धकारस्त्रीराजकुलविद्वेषि-विषगरगरदवशीकरण-

विद्वेषोच्चाटनवधबन्धनभयं वा न भवेत् ।

एतैर्मन्त्रैरुदाहृतैः सिद्धैः संसिद्धपूजितैः ।

ॐ नमोऽस्तुते ।

अभये, अनघे, अजिते, अमिते, अमृते, अपरे,

अपराजिते, पठति, सिद्धे जयति सिद्धे,

स्मरति सिद्धे, एकोनाशीतितमे, एकाकिनि, निश्चेतसि,

सुद्रुमे, सुगन्धे, एकान्नशे, उमे ध्रुवे, अरुन्धति,

गायत्रि, सावित्रि, जातवेदसि, मानस्तोके, सरस्वति,

धरणि, धारणि, सौदामनि, अदिति, दिति, विनते,

गौरि, गान्धारि, मातङ्गी कृष्णे, यशोदे, सत्यवादिनि,

ब्रह्मवादिनि, कालि, कपालिनि, करालनेत्रे, भद्रे, निद्रे,

सत्योपयाचनकरि, स्थलगतं जलगतं अन्तरिक्षगतं

वा मां रक्ष सर्वोपद्रवेभ्यः स्वाहा ।

यस्याः प्रणश्यते पुष्पं गर्भो वा पतते यदि ।

म्रियते बालको यस्याः काकवन्ध्या च या भवेत् ॥ ११॥

धारयेद्या इमां विद्यामेतैर्दोषैर्न लिप्यते ।

गर्भिणी जीववत्सा स्यात्पुत्रिणी स्यान्न संशयः ॥ १२॥

भूर्जपत्रे त्विमां विद्यां लिखित्वा गन्धचन्दनैः ।

एतैर्दोषैर्न लिप्येत सुभगा पुत्रिणी भवेत् ॥ १३॥

रणे राजकुले द्यूते नित्यं तस्य जयो भवेत् ।

शस्त्रं वारयते ह्येषा समरे काण्डदारुणे ॥ १४॥

गुल्मशूलाक्षिरोगाणां क्षिप्रं नाश्यति च व्यथाम् ॥

शिरोरोगज्वराणां न नाशिनी सर्वदेहिनाम् ॥ १५॥

इत्येषा कथिता विद्या अभयाख्याऽपराजिता ।

एतस्याः स्मृतिमात्रेण भयं क्वापि न जायते ॥ १६॥

नोपसर्गा न रोगाश्च न योधा नापि तस्कराः ।

न राजानो न सर्पाश्च न द्वेष्टारो न शत्रवः ॥१७॥

यक्षराक्षसवेताला न शाकिन्यो न च ग्रहाः ।

अग्नेर्भयं न वाताच्च न स्मुद्रान्न वै विषात् ॥ १८॥

कार्मणं वा शत्रुकृतं वशीकरणमेव च ।

उच्चाटनं स्तम्भनं च विद्वेषणमथापि वा ॥ १९॥

न किञ्चित्प्रभवेत्तत्र यत्रैषा वर्ततेऽभया ।

पठेद् वा यदि वा चित्रे पुस्तके वा मुखेऽथवा ॥ २०॥

हृदि वा द्वारदेशे वा वर्तते ह्यभयः पुमान् ।

हृदये विन्यसेदेतां ध्यायेद्देवीं चतुर्भुजाम् ॥ २१॥

रक्तमाल्याम्बरधरां पद्मरागसमप्रभाम् ।

पाशाङ्कुशाभयवरैरलङ्कृतसुविग्रहाम् ॥ २२॥

साधकेभ्यः प्रयच्छन्तीं मन्त्रवर्णामृतान्यपि ।

नातः परतरं किञ्चिद्वशीकरणमनुत्तमम् ॥ २३॥

रक्षणं पावनं चापि नात्र कार्या विचारणा ।

प्रातः कुमारिकाः पूज्याः खाद्यैराभरणैरपि ।

तदिदं वाचनीयं स्यात्तत्प्रीत्या प्रीयते तु माम् ॥ २४॥

ॐ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि विद्यामपि महाबलाम् ।

सर्वदुष्टप्रशमनीं सर्वशत्रुक्षयङ्करीम् ॥ २५॥

दारिद्र्यदुःखशमनीं दौर्भाग्यव्याधिनाशिनीम् ।

भूतप्रेतपिशाचानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ॥ २६॥

डाकिनी शाकिनी-स्कन्द-कूष्माण्डानां च नाशिनीम् ।

महारौद्रिं महाशक्तिं सद्यः प्रत्ययकारिणीम् ॥ २७॥

गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वस्वं पार्वतीपतेः ।

तामहं ते प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः श‍ृणु ॥ २८॥

एकान्हिकं द्व्यन्हिकं च चातुर्थिकार्द्धमासिकम् ।

द्वैमासिकं त्रैमासिकं तथा चातुर्मासिकम् ॥ २९॥

पाञ्चमासिकं षाङ्मासिकं वातिक पैत्तिकज्वरम् ।

श्लैष्पिकं सात्रिपातिकं तथैव सततज्वरम् ॥ ३०॥

मौहूर्तिकं पैत्तिकं शीतज्वरं विषमज्वरम् ।

द्व्यहिन्कं त्र्यह्निकं चैव ज्वरमेकाह्निकं तथा ।

क्षिप्रं नाशयेते नित्यं स्मरणादपराजिता ॥ ३१॥

ॐ हॄं हन हन, कालि शर शर, गौरि धम्,

धम्, विद्ये आले ताले माले गन्धे बन्धे पच पच

विद्ये नाशय नाशय पापं हर हर संहारय वा

दुःखस्वप्नविनाशिनि कमलस्थिते विनायकमातः

रजनि सन्ध्ये, दुन्दुभिनादे, मानसवेगे, शङ्खिनि,

चक्रिणि गदिनि वज्रिणि शूलिनि अपमृत्युविनाशिनि

विश्वेश्वरि द्रविडि द्राविडि द्रविणि द्राविणि

केशवदयिते पशुपतिसहिते दुन्दुभिदमनि दुर्म्मददमनि ।

शबरि किराति मातङ्गि ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं

क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु ।

ये मां द्विषन्ति प्रत्यक्षं परोक्षं वा तान् सर्वान्

दम दम मर्दय मर्दय तापय तापय गोपय गोपय

पातय पातय शोषय शोषय उत्सादय उत्सादय

ब्रह्माणि वैष्णवि माहेश्वरि कौमारि वाराहि नारसिंहि

ऐन्द्रि चामुण्डे महालक्ष्मि वैनायिकि औपेन्द्रि

आग्नेयि चण्डि नैरृति वायव्ये सौम्ये ऐशानि

ऊर्ध्वमधोरक्ष प्रचण्डविद्ये इन्द्रोपेन्द्रभगिनि ।

ॐ नमो देवि जये विजये शान्ति स्वस्ति-तुष्टि पुष्टि- विवर्द्धिनि ।कामाङ्कुशे कामदुघे सर्वकामवरप्रदे ।

सर्वभूतेषु मां प्रियं कुरु कुरु स्वाहा ।

आकर्षणि आवेशनि-, ज्वालामालिनि-, रमणि रामणि,

धरणि धारिणि, तपनि तापिनि, मदनि मादिनि, शोषणि सम्मोहिनि । नीलपताके महानीले महागौरि महाश्रिये ।

महाचान्द्रि महासौरि महामायूरि आदित्यरश्मि जाह्नवि ।

यमघण्टे किणि किणि चिन्तामणि ।

सुगन्धे सुरभे सुरासुरोत्पन्ने सर्वकामदुघे ।

यद्यथा मनीषितं कार्यं तन्मम सिद्ध्यतु स्वाहा ।

ॐ स्वाहा ।

ॐ भूः स्वाहा ।

ॐ भुवः स्वाहा ।

ॐ स्वः स्वहा ।

ॐ महः स्वहा ।

ॐ जनः स्वहा ।

ॐ तपः स्वाहा ।

ॐ सत्यं स्वाहा ।

ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा ।

यत एवागतं पापं तत्रैव प्रतिगच्छतु स्वाहेत्योम् ।

अमोघैषा महाविद्या वैष्णवी चापराजिता ॥ ३२॥

स्वयं विष्णुप्रणीता च सिद्धेयं पाठतः सदा ।

एषा महाबला नाम कथिता तेऽपराजिता ॥ ३३॥

नानया सदृशी रक्षा। त्रिषु लोकेषु विद्यते ।

तमोगुणमयी साक्षद्रौद्री शक्तिरियं मता ॥ ३४॥

कृतान्तोऽपि यतो भीतः पादमूले व्यवस्थितः ।

मूलाधारे न्यसेदेतां रात्रावेनं च संस्मरेत् ॥ ३५॥

नीलजीमूतसङ्काशां तडित्कपिलकेशिकाम् ।

उद्यदादित्यसङ्काशां नेत्रत्रयविराजिताम् ॥ ३६॥

शक्तिं त्रिशूलं शङ्खं च पानपात्रं च विभ्रतीम् ।

व्याघ्रचर्मपरीधानां किङ्किणीजालमण्डिताम् ॥ ३७॥

धावन्तीं गगनस्यान्तः पादुकाहितपादकाम् ।

दंष्ट्राकरालवदनां व्यालकुण्डलभूषिताम् ॥ ३८॥

व्यात्तवक्त्रां ललज्जिह्वां भृकुटीकुटिलालकाम् ।

स्वभक्तद्वेषिणां रक्तं पिबन्तीं पानपात्रतः ॥ ३९॥

सप्तधातून् शोषयन्तीं क्रूरदृष्ट्या विलोकनात् ।

त्रिशूलेन च तज्जिह्वां कीलयन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ ४०॥

पाशेन बद्ध्वा तं साधमानवन्तीं तदन्तिके ।

अर्द्धरात्रस्य समये देवीं धायेन्महाबलाम् ॥ ४१॥

यस्य यस्य वदेन्नाम जपेन्मन्त्रं निशान्तके ।

तस्य तस्य तथावस्थां कुरुते सापि योगिनी ॥ ४२॥

ॐ बले महाबले असिद्धसाधनी स्वाहेति ।

अमोघां पठति सिद्धां श्रीवैष्णवीम् ॥ ४३॥

श्रीमदपराजिताविद्यां ध्यायेत् ।

दुःस्वप्ने दुरारिष्टे च दुर्निमित्ते तथैव च ।

व्यवहारे भेवेत्सिद्धिः पठेद्विघ्नोपशान्तये ॥ ४४॥

यदत्र पाठे जगदम्बिके मया

विसर्गबिन्द्वऽक्षरहीनमीडितम् ।

तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रयान्तु मे

सङ्कल्पसिद्धिस्तु सदैव जायताम् ॥ ४५॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशासि महेश्वरि ।

यादृशासि महादेवी तादृशायै नमो नमः ॥ ४६॥

।। इति अपराजिता स्तोत्रम् ।।

विष्णु सहस्त्रनाम – श्रीहरि विष्णु के 1,000 नाम | Vishnu Sahastranaam

अपराजिता स्तोत्र हिंदी अर्थ | Aparajita Stotra In Hindi

ॐ अपराजिता देवी को नमस्कार। (इस वैष्णवी अपराजिता महाविद्दा के वामदेव, ब्रहस्पति, मारकंडये ऋषि है गायत्री उष्णिग् अनुष्टुप बृहति छन्द, लक्ष्मी नरसिंह देवता, क्लीं बीजम्, हुं शक्ति, सकलकामना सिद्धि के लिए अपराजिता विद्दा मंत्रपाठ में विनियोग है।)

नीलकमलदल के समान, श्यामल रंग वाली, भुजंगो के आभरण से युक्त, शुद्धस्फ़टिक के समान उज्जवल तथा कोटि चन्द्र के प्रकाश के समान मुख वाली, शंख-चक्र धारण करने वाली, बालचंद्र मस्तक पर धारण करने वाली, वैष्णवी अपराजिता देवी को नमस्कार करके महान् तपस्वी मारकण्डेय ऋषि ने इस स्तोत्र का पाठ आरम्भ किया । । १-३। ।  मारकण्डेय ऋषि ने कहा- हे मुनियो।  सिद्धि देने वाली, असिद्धिसाधिका वैष्णवी अपराजिता देवी (के इस स्तोत्र) को श्रवण। । ४। ।  ॐ नारायण भगवान् को नमस्कार, वासुदेव भगवान् को नमस्कार, अनंत्भागवान को नमस्कार, जो सहस्त्र सिर वाले क्षीरसागर में  शयन करने वाले, शेषनाग के शैया में शयन करने वाले, गरुण वाहन वाले, अमोघ, अजन्मा, अजित तथा पीताम्बर धारण करने वाले है।

ॐ हे वासुदेव, संकर्षण प्रद्दुम्न अनिरुद्ध, हयग्रिव, मतस्य, कुर्म, वाराह,नृसिंह, अच्युत,वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर, राम, बलराम, परशुराम, हे वरदायक, आप मेरे लिए वर प्रदायक हों । आपको नमन हैं। ॐ असुर, दैत्य, यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, कुष्मांड, सिद्ध्योगिनी, डाकिनी, शाकिनी, स्कंद्ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र्ग्रह तथा अन्य ग्रहों को मारो-मारो, पाचन करो- पाचन करो ।  मंथन करो- मंथन करो, विध्वंस करो- विध्वंस करो, तोड़ दो- तोड़ दो, चूर्ण करो- चूर्ण करो ।  शंख, चक्र, वज्र, शूल, गदा, मूसल तथा हल से भस्म करो ।

ॐ हे सहस्त्रबाहू, हे सह्स्त्रप्रहार आयुध वाले, जय, विजय, अमित, अजित, अपराजित, अप्रतिहत, सहस्त्र्नेत्र जलाने वाले, प्रज्वलित करने वाले, विश्वरूप, बहुरूप, मधुसूदन, महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्द्नाभ, गोविन्द,  दामोदर, हृषिकेश, केशव, सभी असुरों को उत्सादन करने वाले, हे सभी भूत-प्राणियों को वश में करने वाले, हे सभी दु:स्वप्न को नाश करने वाले, सभी यंत्रो को भेदने वाले, सभी नागों को विमर्दन करने वाले, सर्वदेवों को महादेव, सभी बंधनों को मोक्ष करने वाले, सभी अहितों को मर्दन करने वाले, सभी ज्वरों को नाश करने वाले, सभी ग्रहों का निवारण करने वाले, सभी पापों का प्रशमन करने वाले, हे जनार्दन आपको नमस्कार है ।

ये भगवान् विष्णु की विद्दा सर्वकामना के देने वाली, सर्वसौभाग्य की जननी, सभी भय को नाश करें वाली है । । ५। ।  ये विष्णु की परम वल्लभा सिद्धों के द्वारा पठित है, इसके समान दुष्टों को नाश करने वाली कोई और विद्दा नही है। । ६। ।  ये वैष्णवी अपराजिता विद्दा साक्षात सत्वगुण, सम्निवत, सदा पढने योग्य तथा मार्ग प्रशस्ता है । । ७। ।

ॐ शुक्लवस्त्र धारण करने वाले, चंद्र्वर्ण वाले, चार भुजा वाले, प्रसन्न मुख वाले भगवान् का सर्व विघ्नों का विनाश करने हेतुध्यान करें ।  हे वत्स ।  अब मैं मेरी अभया अपराजिता के विषय में कहूँगा, जो रजोगुणमयी कही गई है । । १। ।  ये सत्व वाली सभी मन्त्रों वाली स्मृत, पूजित, जपित कर्मों में योजित, सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली है ।  इसको ध्यान पूर्वक सुनो । । १०। ।

जो इस अपराजिता परम वैष्णवी, अप्रतिहता पढने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने से सिद्ध होने वाली, विद्दा को सुनें, पढ़ें, स्मरण करें, धारण करें, कीर्तन करें, इससे अग्नि , वायु , वज्र, पत्थर, खड़ग, वृष्टि आदि का भय नहीं होता ।  समुद्र भय, चौर भय, शत्रु भय, शाप भय भी नहीं होता।  रात्री में, अन्धकार में, राजकुल से विद्वेष करने वालों से, विष देने वालों से, वशीकरण आदि टोटका करने वालों से, विद्वेशिओं से, उच्चाटन करने वालों से, वध-भय, बंधन का भय आदि समस्त भय से इसका पाठ करने वाले सुरक्षित हो जाते हैं ।  इन मन्त्रों द्वारा कही गई, सिद्ध साधकों द्वारा पूजित यह अपराजिता शक्ति हैं ।

ॐ आप को नमस्कार है। भयरहित, पापरहित, परिमाण रहित, अमृत तत्व परिपूर्ण, अपरा, अपराजिता पढने से सिद्ध होने वाली, जप करने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने मात्र से सिद्धि से देने वाली, नवासिवाँ स्थान वाली, एकांत प्रिय, निश्चेता, सुदृमा, सुगंधा, एक अन्न लेने वाली, उमा, ध्रुवा, अरुन्धती, गायत्री, सावित्री, जातवेदा, मानस्तोका, सरस्वती, धरणी, धारण करने वाली, सौदामिनी, अदिती, दिती, विनता, गौरी, गांधारी, मातंगी, कृष्णा, यशोदा, सत्यवादिनी, ब्रम्हावादिनी, काली कपालिनी, कराल नेत्र वाली, भद्रा, निद्रा, सत्य की रक्षा करने वाली, जल में, स्थल में, अन्तरिक्ष में, सर्वत्र सभी प्रकार के उपद्रवों से रक्षा करों स्वाहा । (Aparajita Stotra)

जिस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है, गिर जाता है, बालक मर जाता है अथवा वह काक बंध्या भी हो तो इस विद्दा को धारण करने से अर्थात जप करने से गर्भिणी जीववत्सा होगी इसमें कोई संशय नहीं है । । ११-१२। ।  इस मन्त्र को भोजपत्र में चन्दन से लिखकर धारण करने से सौभाग्यवती स्त्रियाँ पुत्रवती हो जाति है, इसमें कोई शंका नहीं है । । १३। ।  युद्ध में, राजकुल में, जुआ में, इस मन्त्र के प्रभाव से नित्य जय हो जाती है ।  भयंकर युद्ध में भी विद्दा अर्थ-शस्त्रों से रक्षा करती है । । २४। ।

गुल्म रोग, शूल रोग, आँख के रोग की व्यथा इससे शीघ्र नाश हो जाती है ।  ये विद्दा शिरोवेदना, ज्वर आदि नाश करने वाली है । । १५। ।   इस प्रकार की अभया ये अपराजिता विद्दा कही गई है, इसके स्मरण मात्र से कही भी भय नहीं होता । । १६। ।  सर्प भय, रोग भय, तरस्करों का भय, योद्धाओं का भय, राज भय, द्वेष करने वालों का भय और शत्रु भय नहीं होता है । । १७। ।  यक्ष, राक्षस, वेताल, शाकिनी, ग्रह, अग्नि, वायु, समुद्र,विष आदि से भय नहीं होता । । १८। ।  क्रिया से शत्रु द्वारा किये हुए वशीकरण हो, उच्चाटन स्तम्भ हो, विद्वेषण हो, इन सबका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं होता । । १९। ।

जहाँ माँ अपराजिता का पाठ हो, यहाँ तक की यदि यह मुख में कंठस्थ हो, लिखित रूप में साथ हो,चित्र अर्थात यन्त्र रूप में लिखा हो तो भी भय-बाधाएं कुछ नहीं कर पाते । । २०। ।  यदि माँ अपराजिता के इस स्तोत्र को तथा चतुर्भुजा स्वरुप को साधक ह्रदय रूप में धारण करेगा तो वह बाहर भीतर सब प्रकार से भयरहित होकर शांत हो जाता है। । २१। । (Aparajita Stotra)

लाल पुष्प की माला धारण की हुई, कोमल कमलकान्ति के समान आभा वाली, पाश अंकुश तथा अभय मुद्राओं से समलड़्कृत सुन्दर स्वरुप वाली । । २२। ।  साधको को मन्त्र वर्ण रूप अमृत को देती हुई, माँ का ध्यान करें ।  इस विद्दा से बढ़कर कोई वशीकरण सिद्धि देने वाली विद्दा नहीं है । । २३। ।  न रक्षा करने वाली, न पवित्र, इसके समान कोई नहीं है, इस विषय म कोई चिन्तन करने की आव्य्शकता नहीं है ।  प्रात:काल में साधको माँ के कुमारी रूप की पूजन विधि खाद्द सामग्री से अनेक प्रकार के आभरणों से करनी चाहिए ।  कुमारी देवी के प्रसन्न होने से मेरी ( अपराजिता की ) प्रीति बढ़ जाती है । । २४। ।

ॐ अब मैं उस महान बलशालिनी विद्दा को कहूँगा, जो सभी दुष्ट दमन करने वाली, सभी शत्रु नाश करने वाली, दारिद्र्य दुःख को नाश करने वाली, दुर्भाग्य का नाश करने वाली, भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस का नाश करने वाली है । । २५-२६। ।  डाकिनी, शाकिनी, स्कन्द, कुष्मांड आदि का नाश करने वाली, महारौद्र रूपा, महाशक्ति शालिनी, तत्काल विशवास देने वाली है । । २७। ।  ये विद्दा अत्यन्त गोपनीय तथा पार्वती पति भगवान् भोलेनाथ की सर्वस्व है, इसलिए इसे गुप्त रखना चाहिए ।  ऐसी विद्दा तुम्हे कहता हु सावधान होकर सुनो । । २८। ।

एक, दो, चार, दिन या आधे महीने, एक महीने, दो महीने, तीन महीने, चार महीने, पाँच महीने, छह महीने तक चलने वाला वाट ज्वर, पित्त सम्बन्धी ज्वर अथवा कफ दोष, सन्निपत हो या मुहूर्त मात्र तक रहने वाला पित्त ज्वर, विष का ज्वर, विषम ज्वर, दो दिन वाला, तीन दिन वाला, एक दिन वाला अथवा अन्य कोई ज्वर हो  वे सब अपराजिता के स्मरण मात्र से शीघ्र नष्ट हो जाते है । ।  २९-३०-३१। ।

ॐ हृीं हन हन काली शर शर, गौरी धम-धम, हे विद्दा स्वरुपा, हे आले ताले माले गंधे बंधे विद्दा को पचा दो पचा दो, नाश करो नाश करो, पाप हरण करो पाप हरण करो, संहार करो संहार करो, दु:स्वप्न विनाश करने वाली, कमल पुष्प में स्थित, विनायक मात रजनी संध्या स्वरुपा, दुन्दुभी नाद करने वाली, मानस वेग वाली, शंखिनी, चक्रिणी, वज्रिणी, शूलिनी अपस्मृत्यु नाश करने वाली, विश्वेश्वरी द्रविडी द्राविडी द्रविणी द्राविणी केशव दयिते पशुपति सहिते, दुन्दुभी दमन करने वाली, दुर्मद दमन करने वाली, शबरी किराती मातड़्गी ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु ।

जो प्रत्यक्ष या परोक्ष में मुझसे जलते है, उन सबका दमन करो- दमन करो, मर्दन करो – मर्दन करो, तापित करो तापित करो, छिपा दो छिपा दो, गिरा दो गिरा दो, शोषण करो शोषण करो, उत्सादित करो, उत्सादित करो, हे ब्रह्माणी, हे वैष्णवी, हे माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, हे नृसिंह सम्बन्धिनी, ऐन्द्री, चामुंडा, महालक्ष्मी, हे विनायक सम्बन्धिनी, हे उपेन्द्र सम्बन्धिनी, हे अग्नि सम्बन्धिनी, हे चंडी, हे नैॠत्य सम्बन्धिनी, हे वायव्या, हे सौम्या, हे ईशान सम्बन्धिनी, हे प्रचण्डविद्दा वाली, हे इन्द्र तथा उपेन्द्र की भागिनी आप ऊपर तथा नीचे से सब प्रकार से रक्षा करें ।

ॐ जया विजया शान्ति स्वस्ति तुष्ठी पुष्ठी बढाने वाली देवी आपको नमस्कार है ।  दुष्टकामनाओं को अंकुश में करने वाली, शुभकामना  देने वाली, सभी कामनाओं को वरदान देने वाली, सब प्राणियों में मुझे प्रिय करो प्रिय करो स्वाहा ।

आकर्षण करने वाली, आवेशित करने वाली, ज्वाला माला वाली, रमणी, रमाने वाली, पृथ्वी स्वरुपा, धारण करने वाली, तप करने वाली, तपाने वाली, मदन रूपा, मद देने वाली, शोषण करने वाली, सम्मोहन करने वाली, नील्ध्वज वाली, महानील स्वरुपा, महागौरी, महाश्रिया, महाचान्द्री, महासौरी, महामायुरी, आदित्य रश्मि, जाहृवी। यमघंटा किणी किणी ध्वनीवाली, चिन्तामणि, सुगंध वाली, सुरभा, सुर, असुर उत्पन्न करने वाली, सब प्रकार की कामनाये पूर्ति करने वाली, जैसा मेरा मन वांछित कार्य है (यहाँ स्तोत्र का पाठ करने वाले अपनी कामना का चिन्तन कर सकते है।) वह सम्पन्न हो जाये स्वाहा ।

ॐ स्वाहा ।  ॐ भू: स्वाहा ।  ॐ भुव: स्वाहा ।  ॐ स्व: स्वाहा ।  ॐ मह: स्वाहा ।  ॐ जन: स्वाहा ।  ॐ तप: स्वाहा ।  ॐ सत्यम स्वाहा ।  ॐ भूभुर्व: स्व: स्वाहा ।

जो पाप जहा से आया है , वाही लौट जाये स्वाहा ।  ॐ यह महा वैष्णवी अपराजिता महाविद्दा अमोघ फलदायी है । । ३२। ।  ये महाविद्दा महाशक्तिशाली है अत: इसे अपराजिता अर्थात् किसी प्रकार की अन्य विद्द्य से पराजित ना होने वाली कहा गया है ।  इसको स्वयं विष्णु ने निर्मित किया है इसका सदा पाठ करने से सिद्दी प्राप्त होती है । । ३३। ।

इस विद्दा के समान तीनो लोको में कोई रक्षा करने में समर्थ दूसरी विद्दा नहीं है ।  ये तमोगुण स्वरूपा साक्षात रौद्र्शक्ति मानी गई है । । ३४। ।  इस विद्दा के प्रभाव से यमराज भी डरकर चरणों में बैठ जाते है ।  इस विद्दा की मूलाधार स्थापित करना चाहिए तथा राटा को स्मरण करना चाहिए। ।  ३५। ।  नीले मेघ के समान चमकती बिजली जैसे केश वाली, चमकते सूर्य के समान तीन नेत्र वाली माँ मेरे प्रत्यक्ष विराजमान है । । ३६। । (Aparajita Stotra)

शक्ति, त्रिशूल, शंख, पानपात्र को धारण की हुई, व्याघ्र चरम धारण की हुई , किंकिणियों से सुशोभित, मण्डप में विराजमान, गगनमंडल के भीतरी भाग में धावन करती हुई, पादुकाहित चरण वाली, भयंकर दांत तथा मुख वाली, कुण्डल युक्त सर्प के आभरणों से सुसज्जित, खुले मुख वाली, जिहृा को बाहर निकाली हुई, टेड़ी भौंहें वाली, अपने भक्त से शत्रुता करने वालों का रक्त पानपात्र से पीने वाली, क्रूर दृष्टि से देखने पर सात प्रकार के धातु शोषण करने वाली, बारम्बार त्रिशूल से शत्रु के जिहृा को कीलित कर देने वाली, पाश से बाँधकर उसे निकट लाने वाली, ऐसी महाशक्ति शाली माँ को आधी रात के समय में ध्यान करे। । ३७-४१। ।  फिर रात के तीसरे प्रहर में जिस जिसका नाम लेकर जिस हेतु जप किया जाये उस- उस को वैसा स्वरुप बना देती है ये योगिनी माता । । ४२।। (Aparajita Stotra)

ॐ बला महाबला असिद्द्साधनी स्वाहा इति ।  इस अमोघ सिद्ध श्रीवैष्णवी विद्दा, श्रीमद अपराजिता को दु:स्वप्न, दुरारिष्ट, आपदा की अवस्था में अथवा किसी कार्य के आरम्भ में ध्यान करें तो इससे विघ्न बाधाये शांत हो जायेंगी ।  सिद्धि प्राप्त होगी । । ४३-४४। । हे जगज्जननी माँ इस स्तोत्र पाठ में मेरे द्वारा यदि विसर्ग, अनुस्वार, अक्षर, पाठ छोड़ गया हो तो भी माँ आपसे क्षमा प्रार्थना करता हुँ की मेरे पाठ का पूर्ण फल मिले, मेरे संकल्प की अवश्य सिद्धि हो अर्थात किसी भी प्रकार की उच्चारण की भूल को क्षमा करें । । ४५। ।

हे माँ मैं आपके वास्तविक स्वरुप को नही जानता आप कैसी है ये भी नहीं जानता, बस मुझे इतना पता है की आपका रूप जैसा भी हो मैं उसी रूप को पुजरा हुँ ।  आपके सभी रूपों को नमस्कार हैं अर्थात हे अपराजिता माँ आपका स्वरुप अपरम्पार है, उसे जाना नहीं जा सकता, आपके विलक्षण स्वरुप को हमारा शत शत नमन है । । ४६।

।।  श्री दुर्गापूर्णं अस्तु ।।

इस स्तोत्र का विधिवत पाठ करने से सब प्रकार के रोग तथा सब प्रकार के शत्रु और सब बन्ध्या दोष नष्ट होता है ।

विशेष रूप से मुकदमें में सफलता और राजकीय कार्यों में

अपराजित रहने के लिये यह पाठ रामबाण है ।

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